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सिंध प्रदेश की पुरानी गायन परम्परा रही है – भगत: लेखक अशोक मनवानी

जिस तरह कर्णाटक में यक्ष गान ,छत्तीसगढ़ में पंडवानी ,राजस्थान में ढोला मारू के कथा गायन लोकप्रिय हैं उसी तरह सिंध प्रदेश की पुरानी गायन परम्परा रही है – भगत . इसे कला भी कह सकते हैं , आध्यात्म भी और सामाजिक मेल मिलाप भी . संत कँवर राम जी ने देश की आजादी के पहले इस लोक गायन से जन जागृति का अहम् कार्य भी किया था . वर्ष 1939 में संत जी , आततायियो के हाथों मारे गए . उन्होंने सीने पर गोलियां खाईं और हरे राम … कहते अपने प्राण त्यागे थे . तब से संत कँवर राम जी की शहादत दिवस के मौके पर सिंध और हिन्द में रहने वाले सिन्धी बन्धु भगत गायन का आयोजन करते आ रहे हैं . आम तौर पर रात भर यह गायन चलता है , भगत प्रस्तुत करने वाले गायक और नर्तक खुद भी भगत कहलाते हैं जो एक सम्मान जनक संबोधन है . टीवी और इन्टरनेट के विस्तार के बाद लोकरंजन और भाव भक्ति के कार्यक्रम प्रभावित हुए हैं पर परम्परा ख़त्म नहीं हुई . भोपाल में मोहन मनवानी ने परिवार की सालाना रस्म निभाते हुए गत दो दशक से भारत के ख्यात भगत प्रस्तुत कर्ता कलाकारों को आमंत्रित किया है . कार्यक्रम में पांच सौ लोगों की संख्या सम्मान जनक मानी जा सकती है . जब कि एक ही परिवार स्वयं के साधनों से आयोजन कर रहा हो . निश्चित ही अजमेरी हलवाई परिवार (यह संत हिरददाराम नगर के मनवानी परिवार का प्रचलित नाम है ) की यह प्रशंसनीय कोशिश है. एक लुप्त हो रही रीति और लोक कला का संरक्षण भी . विशेष उल्लेख योग्य बात यह भी इस वर्ष दिखाई दी कि कार्यक्रम युवा वर्ग को आकर्षित करने में भी सफल रहा . इस वर्ष पधारे थे , मुंबई के भगत मोहन लाल जी . उनकी संगीत और नर्तक मण्डली भोपाल में २४ और २५ अक्टूबर को भक्ति , संगीत , नृत्य और लोक आख्यान की समृद्ध प्राचीन परम्परा से साक्षात्कार कराने और धूम मचाने में कामयाब रही. आयोजक साधुवाद के पात्र हैं . भारत में इस समय बमुश्किल १० – १५ भगत गायक शेष हैं .

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