20 जून को इंटरनेशनल रिफ्यूजी दिवस पर विशेष
सिंधी हिन्दुओं को सच्चा सनातनी एवं देशभक्त माना जाता है, वह इसलिए क्योंकि जब 14 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान इस्लामिक कंट्री घोषात की गई, तब सिंधियों ने अपनी पुरूखों की जमीन, जायजाद और जन्म स्थली को केवल इसलिए अलविदा कह दिया क्योंकि उसने ढेर सारी तकलीफें सहना स्वीकार किया, लेकिन मुस्लिम देश की अधीनता स्वीकार नहीं की। सिंधी हिन्दुओं के पलायन का सिलसिला जनवरी 1948 से उस वक्त से प्रारंभ हुआ, जब भारत से गए मुसलमानों ने उनके साथ ज्यादतियां शुरू की और वहां के भूमिहीन मुस्लिम किसानों का नेतृत्व करने वाले जीएम सैय्यद जैसी कटरपंथी हमला करने लगे। इसके बाद अनेक सिंधी हिन्दुओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
नहीं मिला अलग राज्य
वैसे तो महात्मा गांधी ने आजाद भारत में गुजरात एवं राजस्थान के जो इलाके पाकिस्तान की सरहद से मिलते हैं, जहां कच्छी और सिंधी बोली जाती है, कुछ इलाकों को मिलाकर आजाद भारत में पृथक सिंधु प्रदेश बनाने का वादा किया था, लेकिन महात्मा गांधी की हत्या एवं जवाहरलाल नेहरू की बेरूखी के कारण भारत में पृथक सिंधु प्रांत का सपना साकार नहीं हो सका और सिंधी देश व विदेशों में अलग अलग स्थानों पर बस गए।
जितनी कठिन परिस्थितियों में सिंधी हिन्दु भारत आए, तो वे सरकारी नौकरियों व चुनावों में कम से कम 10 प्रतिशत आरक्षण के हकदार थे, लेकिन वह भी नहीं मिला। इतना ही नहीं अलग प्रांत न होने से सिंधी साहित्य, कला, भाषा का भी भारी नुकसान हुआ और सिंधी लिपि आज अंमित सांसे ले रही है।
तंग गलियों में जीवन
अगर बात की जाए सिंधी बाहुल्य इलाके संत हिरदाराम नगर (बैरागढ़) की तो यहां भी 50 फीसदी सिंधी ही सम्पन हैं लेकिन 50 प्रतिशत सिंधी कठिनाई में जीवन जी रहे हैं एच वार्ड , सीआरपी एवं संजय कालोनी की तंग गलियों में 300 वर्गफीट के मकान में 4 से 5 सदस्य निवास कर रहे हैं, जहां गन्दगी का अम्बार है, हवा पानी व रोशनी घरों से दूर है लेकिन सरकार आजादी के 79 साल बाद भी इनकी समस्याओं का निराकरण नहीं कर पाई है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है।
प्रापर्टी के हक से वंचित
सिंधी हिन्दुओं ने खुद को स्थापित करने में ढेर सारे कष्ट तो सहे लेकिन सरकार की तरफ से जहां उन्हें वाजिक हक नहीं मिले वहीं 79 साल बाद भी वह प्रापर्टी के मालिकाना हक से वंचित हैं। अगर बात की जाए सिंधी बाहुल्य क्षेत्र बैरागढ़ की जहां विभाजन के बाद 1948 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इटेलियन कैदियों के लिए बनाई गई बैरिकों में बसाया गया, आज भले ही वहां आलीशान मकान नजर आते हों लेकिन सरकार ने मालिकाना हक आज तक नहीं दिया है जबकि महाराट्र में यह हक पिछले माह 10 मई को नागपुर में आयोजित एक भव्य समारोह में प्रदान किया।
निकले आदेशों, निर्देशों पर अमल नहीं
ऐसी बात नहीं है कि मध्यप्रदेश में सिंधियों के पक्ष में आदेश निर्देश नहीं निकले हों लेकिन उनका आज तक पालन नहीं हो सका है अगर इन आदेशों व निर्देशों को देखा जाए तो पता चलता है कि पुर्नवास एवं राजस्व विभाग ने 9 जुलाई 1986 को समस्त कलेक्टरों को जारी परिपत्र क्रमांक एफ 6-115/आठ(9)77 में स्पष्ट रूप से निर्देश दिए गए हैं कि भारत पाकिस्तान विभाजन के फलस्वरूप पश्चिमी पाकिस्तान से आए विस्थापित परिवारों के व्यवस्थापन के संबंध में राजस्व पुस्तक परिपत्र 4-1 की कंडिका 27 के अनुरूप भूमिक व्यवस्थापित किए जाने का निर्णय लिया गया है। विस्थापितों को 4800 वर्गफीट तक की भूमि के लिए प्रब्याजि रूपये 500 तथा वार्षिक भू-भाटक 31.25 रूपये वसूल किया जाए। वार्षिक भू-भाटक 31 दिसम्बर 1970 के बाद वसूल किया जाए और 4800 वर्गफुट से अधिक अतिक्रमिक भूमि के लिए नियमानुसार प्रचलित दर पर प्रब्याजि एवं भू- भाटक का निर्धारण किया जाए। जिनका अतिक्रमण 31 दिसम्बर 1976 या उसके पूर्व का हो। इसके राजस्व विभाग ने पुनः 18 एवं 24 फरवरी 1994 को आदेश क्रमांक 6-144/सात/सा-2बी/89 द्वारा भी समस्त कलेक्टरों को निर्देशित किया है कि ऐसी शिकायतें प्राप्त हुई हैं कि 9 जुलाई 1986 को दिए गए निर्देशों का पालन पूरी तरह से नहीं किया गया है और कई नगरों में सिंधी विस्थापितों के प्रकरण लंबित है, उनका निराकरण 3 माह में विशेष अभियान चलाकर किया जाए। इधर जिन 500 सिंधी विस्थापित परिवारों का संत हिरदाराम नगर के वन ट्री हिल्स इलाके में भूखण्डों का आवंटन हुआ उनकी लीज 2018 में खत्म हो चुकी है, और वे नवीनीकरण के लिए दर दर भटक रहे हैं।
31 मार्च 2023
इधर 31 मार्च 2023 को भोपाल के भेल दाहरा मैदान पर विश्वभर के सिंधियों के जामावड़े में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, सिंधियों के महामंडलेवर हंसराम महाराज के समक्ष उस समय के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सिंधी परिवारों को प्रापर्टी का मालिकाना हक देने की फिर घोषणा की साथ ही मप्र सिंधी साहित्य अकादमी का बजट बढ़ाकर 5 करोड़ करने, सिंधु दर्शन तीर्थ यात्रा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को 25 हजार का अनुदान देने एवं सिंधी महापुरूषों की जीवनी को पाठ्यक्रम में शामिल मिल करने की घोाणा की पर आज तक उस पर अमल नहीं हो सका है।
इस तरह देश की आजादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने एवं सच्चे हिन्दु होने के नाते जन्म स्थली तक को कुर्बान करने वाले सिंधी विस्थापित परिवार आज भी कष्ट झेल रहे हैं लेकिन उनकी कोई सुनने वाला नहीं है।




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