वर्ष 1987 की बात है। तेज ठंड पड़ रही थी। आखिरी महीना था साल का। जबलपुर संभागीय जनसंपर्क कार्यालय में 2 महीने पहले ही मैंने सहायक जनसंपर्क अधिकारी के पद पर ज्वाइन किया था। हमारे मंडला के जनसंपर्क अधिकारी छुट्टी पर थे। रात्रि 9 बजे कलेक्टर जबलपुर डॉ. भागीरथ प्रसाद का संदेश पहुंचता है ,नारायणपुर जो मंडला जिले में है वहां एक पानी से भरे ,आवागमन से बंद किए गए रपटे में बारात लेकर इंदौर से दुर्ग जा रही यात्री बस गहरे पानी में उतर गई है। बस ने जल समाधि ले ली थी कुछ लोग तैरकर बाहर आ गए। फिर भी लगभग 25 या 30 लोगों के मरने की आशंका व्यक्त की गई।
मेरे सीनियर अफसर ने कहा कि अशोक तुम तत्काल वहां जाओ, वहां जो राहत कार्य चल रहे हैं उसकी रिपोर्ट बनाकर ले आओ। हम रात में ही जबलपुर के सभी अखबारों में दे देंगे। उन दिनों एक दो क्या, कोई भी टीवी चैनल नहीं थे। दूरदर्शन भोपाल शुरू नहीं हुआ था तो दिल्ली तक भी यह खबर जानी तो थी ही। लेकिन किस फॉर्मेट में जाएगी बड़ा मुश्किल सा था। तो, टेक्स्ट लिखा हुआ ही हर जगह बिकता था और लैंड लाइन से कॉल कर फोन पर चिल्ला चिल्ला कर भी हम समाचार लिखवाया करते थे। टेली प्रिंटर सुविधा थी जो मध्य प्रदेश में सूचना प्रौद्योगिकी की शुरुआत के दौर के पहले के दौर की कहानी है। सन 1960 से ही यह तकनीक जनसंपर्क के माध्यम से काम में लाई जा रही थी। फैक्स और टेलेक्स भी बाद में अपनाए गए। ऐसे विभागों में पहला पहला जनसंपर्क विभाग का नाम था जो उन दिनों सूचना प्रकाशन विभाग होता था। सूचना प्रकाशन नाम वाले विभाग में नियुक्त होने वाला मैं आखिरी जनसंपर्क अधिकारी था। वर्ष 1988 से यह विभाग जनसंपर्क हो गया। बहरहाल घटना जो भी हुई, दर्दनाक थी। मंडला के तत्कालीन कलेक्टर एमएस खान साहब रेस्क्यू ऑपरेशन को लीड कर रहे थे। वे तहसीलदार और क्षेत्र के डिप्टी कलेक्टर को तैनात कर, चाहते तो आराम करने चले जाते लेकिन वहीं डटे रहे। घायलों को बचाने ,कंबल देने और भोजन देने से लेकर अस्पताल में दाखिल करवाने के सभी कार्यों में लगे थे।
जो लोग नहीं रहे उनकी हालत देखकर ह्रदय फट जाता था। वे बस में अपनी सीट पर ही ठंडे पानी में अकड़ कर स्थिर हो गए थे।
ऐसी स्थिति में प्रशासन का काम प्रभावितों को राहत पहुंचना और संवाद एजेंसियों का काम लोगों तक सही सूचना पहुंचना होता है। तेज गाड़ी चलाते हुए वाहन चालक गोपाल जी जबलपुर की ओर बढ़ चले।
आधी रात तक दैनिक भास्कर सहित सभी अखबारों में समाचार ,जिसमें जान गंवाने वालों की सूची,घायलों की सूची आदि देने का काम किया। दूसरे दिन प्रशंसा भी हुई।दुर्घटना की पीड़ा तो सभी को थी। विधाता की व्यवस्था के आगे तो सभी विवश होते हैं लेकिन हम अपना पार्ट अच्छी तरह कर लें , यही बात सुकून देती है। इस वाकये को इतने बरस लिख नहीं सका था।
कुछ दिन पूर्व सिविल लाइंस भोपाल में खान साहब से भेंट हो गई। उन्हें भी यह किस्सा याद दिलाया। साथ ही डी जी भावे साहब द्वारा कृषि उत्पादन आयुक्त के रूप में जबलपुर में संभागीय खरीफ बैठक में उनकी बातों का स्मरण दिलवाया। खान साहब रहने वाले शनिचरी मोहल्ला सागर के हैं। इस नाते भी हम एक गृह नगर के होने से पहली मुलाकात से लेकर अभी इतने बरस बाद की मुलाकात तक सहज रहे हैं। शासन में कम्युनिकेशन के काम के अनुभवों को लिखते हुए ऐसे अनुभवी अफसर से काफी कुछ सीखने को भी मिलता है। लोक सेवक अपनी नींद, अपना चैन खोकर संतोष प्राप्त करते हैं। जनता के लिए कार्य करते हुए बीते जीवन के यह बरस सभी को ताउम्र याद भी रहते हैं। यह संस्मरण अपनी पुस्तक में भी शामिल करने का विचार है।




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