मेरे दादा के गांव छत्तीसगढ़ के मुंगेली का जिक्र करता और उनसे जनसंपर्क के वरिष्ठ अधिकारी रहे और लोक कलाओं के मर्मज्ञ भाऊ खिरवड़कर जी के साथ हुई प्रथम भेंट का भी स्मरण दिलवाता था तो वे मुस्कुरा देती थीं।वे अपनी कल यात्रा से संतुष्ट भी रहीं।दरअसल उन्होंने इस कला में मौलिक शैली से कई नवाचार भी किये।पंडवानी गायन की कला को समृद्ध किया ,तभी तो वे विश्व विख्यात भी बन गईं।
मुझे याद आ रहा हूं उनका आखिरी कार्यक्रम दो-तीन साल पहले भोजपुर उत्सव में सुना। एक समय था जब वे भोपाल लगभग हर साल ही आती थीं। भोपाल में बसे छत्तीसगढ़ से संबंध रखने वाले नागरिक और मजदूरी का कार्य करने वाले छत्तीसगढ़ी समुदाय के दर्शक श्रोता भी तब सुनने आया करते थे।
जब श्रीमती तीजन बाई गाती थीं तो पंडवानी गायन में उनका एक संवाद याद आता है,जब उनका स्वर होता था… “भगवान रामचंद्र बोलीस” तो उनका सहयोगी कलाकार पूछता था “क्या बोलीस ?
“और दर्शक,श्रोता मंत्र मुग्ध हो जाते थे। एक समर्पित कलाकार को श्रद्धा से नमन।

–अशोक मनवानी
जनसंपर्क प्रीरभारी संयुक्त संचालक।




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